तक्षशिला विश्वविद्यालय
तक्षशिला विश्वविद्यालय भारत ही नहीं दुनिया के सबसे पुराने विश्वविद्यालय में से एक था। जहां एक तरफ इस विश्वविद्यालय में वैदिक शिक्षा की पढ़ाई होती थी। वहीं दूसरी ओर यहां चिकित्सा, योग, सर्जरी की भी पढ़ाई होती थी।
नालंदा विश्वविद्यालय
आज भी बिहार की पहचान है, नालंदा विश्वविद्यालय। यहां पौराणिक काल से ही आयुर्वेद और बौद्ध चिकित्सा की शिक्षा दी जाती थी। यह विश्वविद्यालय आयुर्वेद और बौद्ध चिकित्सा का प्रमुख केंद्र था। आचार्य चाणक्य के अनुसार, ‘अर्थशास्त्र’ में जन स्वास्थ्य, महामारी नियंत्रण और आयुर्वेद आधारित चिकित्सा का वर्णन मिलता है।
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हर काल में भारत में समृद्ध हुई चिकित्सा विज्ञान
बौद्ध काल
वैद्य जीवक कुमारभच्छ : सम्राट बिंबिसार के राजवैद्य, पीलिया के उपचार और प्रसव संबंधी शल्य चिकित्सा के ज्ञाता थे।
मौर्य काल
–सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के शासन में शव परीक्षण से अपराधों के मामलों का निर्णय लिया जाता था।
–राजा के आपातकालीन उपचार के लिए दरबार में हमेशा राजवैद्य तैनात रहते थे। यही व्यवस्था आज अतिविशिष्ट व्यक्तियों के साथ भी की जाती है। –निशुल्क चिकित्सालय होते थे। आज सरकारें निशुल्क इलाज और दवा योजनाएं चलाती हैं।
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सम्राट अशोक का काल
–सम्राट अशोक ने निशुल्क चिकित्सालयों और औषधि उद्यानों की स्थापना करवाई।
–बौद्ध भिक्षु चिकित्सा प्रणाली के प्रचारक बने और इसे एशिया में फैलाया।
गुप्त काल
–यह आयुर्वेद का स्वर्ण युग कहलाता है। –इस दौरान सुश्रुत संहिता और चरक संहिता का पुनर्लेखन किया गया।
–नालंदा विश्वविद्यालय चिकित्सा शिक्षा का केंद्र बना। –तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालयों में आयुर्वेद की शिक्षा दी जाती थी। –चिकित्सा पद्धति संगठित हुई और इसमें आयुर्वेद, सर्जरी, औषधि विज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य को स्थान मिला।
मध्यकालीन आयुर्वेद
–वाग्भट्ट और अन्य विद्वानों ने आयुर्वेद को समृद्ध किया। –भारत में यूनानी चिकित्सा का प्रभाव भी आया।
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योग के जनक महर्षि पतंजलि (मौर्य काल और शुंग काल)
–ध्यान, प्राणायाम, आसन, संयम, समाधि आदि का वैज्ञानिक तरीके से वर्णन किया।
–एमआइटी, हार्वर्ड समेत अमरीका के कई विश्वविद्यालयों में योगसूत्रों पर शोध हो रहे हैं। आज योग विज्ञान को मान्यता देते हुए वर्ष 2014 से संयुक्त राष्ट्र 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाता है।