वाराणसी में रहकर चंद्रशेखर आजाद को क्रांतिकारी गतिविधियों की जानकारी मिलने लगी। उस समय बनारस क्रांतिकारी विचारों का गढ़ बन चुका था। वहां से निकलने वाले समाचार पत्रों, भाषणों और छात्रों की चर्चाओं ने उनके भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने की भावना को और तेज कर दिया। यहीं पर उन्होंने यह महसूस किया कि केवल धर्मग्रंथों को पढ़ना काफी नहीं है, जब तक देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा है। चंद्रशेखर आजाद ने 15 वर्ष की उम्र में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। 1921 में वे इस आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हो गए। जब उन्हें अदालत में पेश किया गया, तो जज के सवालों का जवाब उन्होंने पूरे आत्मविश्वास और व्यंग्यात्मक अंदाज में दिया। नाम पूछा गया तो बोले, “आज़ाद”, पिता का नाम – “स्वतंत्रता”, और पता – “जेल”। उस दिन से वे चंद्रशेखर तिवारी से चंद्रशेखर ‘आजाद’ बन गए।