Explainer: भारत-पाकिस्तान के बीच आखिर क्या है सिंधु जल समझौता (Indus Waters Treaty)? डिटेल में समझें | Explainer What is the Indus Waters Treaty between India and Pakistan Sindhu Water Treaty

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Indus Waters Treaty: 1960 में हुआ था समझौता

भारत और पाकिस्तान के बीच लगभग 9 साल तक बातचीत चलने के बाद, सितंबर 1960 में सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) पर समझौता हुआ। इस समझौते में विश्व बैंक ने मध्यस्थ (बीच का पक्ष) बनकर अहम भूमिका निभाई और वह भी इस संधि में एक हस्ताक्षरकर्ता रहा। इस समझौते का मकसद था कि सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों, जिसमें सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलज शामिल है। इन सभी नदियों का पानी दोनों देशों के बीच किस तरह बांटा जाए, इसका साफ नियम बनाया जाए।

Sindhu Water Treaty: 6 नदियों को दो देशों में बांटा गया

संधि के मुताबिक, तीन पश्चिमी नदियां, सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकतर पानी पाकिस्तान को उपयोग करने की पूरी छूट दी गई। वहीं, तीन पूर्वी नदियां, रावी, ब्यास और सतलज का पानी भारत को पूरी तरह इस्तेमाल करने का अधिकार दिया गया।
हालांकि, भारत को भी कुछ सीमित हद तक पश्चिमी नदियों का पानी घरेलू, कृषि और कुछ खास गैर-उपभोग उपयोगों के लिए लेने की अनुमति है। इस बंटवारे का मतलब यह हुआ कि कुल पानी का करीब 80% हिस्सा पाकिस्तान के पास गया और 20% पानी भारत को मिला।

Indus Waters Treaty: आयोग का हुआ गठन

इस संधि के साथ ही एक स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission) भी बनाया गया, जिसमें भारत और पाकिस्तान दोनों के एक-एक आयुक्त शामिल होते हैं। इस आयोग की जिम्मेदारी है कि दोनों देशों के बीच जल मामलों पर बातचीत बनी रहे। संधि के अनुसार, यह आयोग हर साल कम से कम एक बार बैठक जरूर करता है। कभी भारत में और कभी पाकिस्तान में।

What Is Indus Waters Treaty: सिंधु जल संधि के कुछ अहम बिंदु

हस्ताक्षर की तारीख और मध्यस्थता
भारत और पाकिस्तान ने लगभग एक दशक तक बातचीत करने के बाद 19 सितंबर 1960 को सिंधु जल संधि पर दस्तखत किए। इस ऐतिहासिक समझौते में विश्व बैंक ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी और वह भी संधि का एक हस्ताक्षरकर्ता था।

संधि का उद्देश्य
इस संधि का मूल उद्देश्य सीमा पार बहने वाली नदियों के जल संसाधनों के न्यायसंगत बंटवारे को सुनिश्चित करना और दोनों देशों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान तथा सहयोग की व्यवस्था स्थापित करना था।

नदियों को बांटना
कुल छह नदियों को दो समूहों में बांटा गया—पूर्वी नदियां: रावी, ब्यास और सतलज; पश्चिमी नदियां: सिंधु, झेलम और चिनाब। पूर्वी नदियों का अधिकार
भारत को पूर्वी नदियों के लगभग 33 मिलियन एकड़ फीट वार्षिक जल का पूर्ण नियंत्रण और उपयोग का अधिकार प्राप्त हुआ।

पश्चिमी नदियों का आवंटन
पश्चिमी नदियों का लगभग 135 मिलियन एकड़ फीट जल पाकिस्तान को सौंपा गया, लेकिन भारत को सीमित मात्रा में इनका उपयोग करने की अनुमति मिली। भारत की सीमित गतिविधियां
भारत को पश्चिमी नदियों पर कृषि, घरेलू जरूरतों और विशेष मानकों के अंतर्गत जलविद्युत परियोजनाओं के संचालन की अनुमति दी गई है।

पाकिस्तान की आपत्ति का अधिकार
पाकिस्तान को यह अधिकार है कि वह भारत द्वारा पश्चिमी नदियों पर प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन पर आपत्ति दर्ज करा सकता है। स्थायी आयोग का गठन
इस संधि के अंतर्गत ‘स्थायी सिंधु आयोग’ की स्थापना की गई, जिसमें दोनों देशों से एक-एक आयुक्त होते हैं, जो नियमित रूप से बैठकें करते हैं।

कोविड-19 के कारण बाधा
वर्ष 2020 में नई दिल्ली में निर्धारित बैठक को कोविड महामारी के कारण रद्द करना पड़ा था, जो कि संधि के तहत निर्धारित वार्षिक संवाद का हिस्सा थी। संधि की प्रस्तावना और नेतृत्व
संधि की प्रस्तावना में यह स्पष्ट किया गया है कि दोनों देशों ने आपसी समझ, सहयोग और सद्भावना की भावना से संधि की है। इस पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के फील्ड मार्शल अयूब खान ने नेतृत्व में हस्ताक्षर किए थे।

India And Pakistan: पाकिस्तान पर क्या असर पड़ेगा

पाकिस्तान की 80 फीसदी खेती योग्य भूमि सिंधु नदी प्रणाली के पानी पर निर्भर है। सिंधु नदी के 93 फीसदी पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाता है। इसपर रोक लगने से खेती करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। साथ ही सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर ही पाकिस्तान के प्रमुख शहर कराची, लाहौर, मुल्तान निर्भर हैं। ऐसे में इसका असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा के काम पर भी पड़ेगा।



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